अंबेडकरनगर। 29 मार्च, 2025
नौशाद खान अशरफी।
सदकए फित्र रोजे की खैरात ( दान ) है। रोजेदार की जुबान से “लग्व” बेहूदा बात निकल जाती है। सदकए फित्र उसका कफ्फारा ( एवज/बदला ) हो जाता है। यानी सदकए फित्र देकर उसका कफ्फारा अदा किया जाता है। ओलमा फरमाते हैं कि हदीस शरीफ में कि इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर ने फरमाया कि बंदा का रोजा आसमान व जमीन के दरम्यिान “मोअल्लक” ( लटका ) रहता है जब तक सदकए फित्र अदा न करें। इसलिए रमजान माह में रोजेदारों को सदकए फित्र अदा करना जरूरी है। किछौछा दरगाह के सज्जादानशीन व ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल ओलमा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सै. मोइनुद्दीन अशरफ बताते हैं कि दूसरे लफ्जों में यूं कहें किं सदकए फित्र के जरिए गरीबों की खुराक का इंतजाम हो जाता है। सदकए फित्र ईद के दिन सुबह का दूसरा उजाला ( सुबहे सादिक ) होते ही वाजिब हो जाता है। अगरचे नमाजे ईद से पहले अदा करना सुन्नत है और बहुत अच्छा माना जाता है।
किसे कहते हैं मालिके निसाबः- अगर किसी मुसलमान के पास जिंदगी गुजारने के लिए जरूरी चीजें छोड़कर 52.5 तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोने की कीमत के बराबर प्रॉपर्टी और रुपया हो तो ऐसे लोगों को मालिके निसाब ( मालदार ) कहा जाता है। ऐसे लोगों के लिए सदकए फित्र व जकात अदा करना जरूरी है।
सदकए फित्र की मिकदार ( वजन/मात्रा ) :-
सदकए फित्र की मिकदार यह है कि गेहूं या उसका आटा या सत्तू “आधा साअ“ अर्थात 2 किलो 47 ग्राम खजूर, मुनक्का या जौ एक साअ ( चार किलो चौरानबे ग्राम ) मर्द मालिके निसाब पर अपनी व अपने नाबालिग औलाद की तरफ से सदकए फित्र वाजिब है। अगर मानसिक रूप से बालिक/मजनू ( पागल ) औलाद है तो बाप को ही सदका अदा करना पड़ेगा। अगर बालिग मजनू औलाद मालदार है तो उसके माल से ही यह अदा किया जाए। गेहूं, जौ, मुन्नका और खजूर के अलावा किसी दूसरी चीज से फितरा/सदकाए फित्र अदा करना चाहें मसलन चावल वगैरह से तो कीमत का लिहाज करना होगा यानी वह चीज/अनाज वगैरह दो किलो सैंतालिस ग्राम की कीमत की हो।
इनको दें जकात सदकए फित्रः-
फकीर-जो मालिके निसाब नहीं।
मिस्कीन-जसके पास कुछ नहीं।
गारीम-जिस पर इतना कर्ज है कि उसे निकलने के बाद निसाब बाकी न रहे।
इनको नहीं दे सकते जकात सद़कएं फित्र-बाप, दादा, दादी, मां, नाना, नानी, बेटा, पोता, पोती, बेटी, नवासा, नवासी, हाशमी, सैयद, मियां, बीवी।
