अंबेडकरनगर। 28 मार्च, 2025
नौशाद खां अशरफी
ओलमा फरमाते हैं कि “रमजान” को रमजान इसलिए कहा जाता है कि ज्यादातर इसमें हरारत ( तपिश ) बढ़ जाती है। क्योंकि रमजान शब्द का अर्थ “झुलसा देना”। जबकि दूसरे कुछ ओलमा फरमाते हैं कि रमजान का मतलब शिद्दते हरारत ( सख्त तपिश ) है। रमजान को रमजान इसलिए कहा जाता है कि रमजान के रोजे की बरकत से दिल पर एक अजीब कैफियत तारी होती है जिसकी वजह से दिल में हरारते फिक्र व बेहतरीन नसीहत का जज्बा पैदा हो जाता है और आखिरत का तसव्वर पुख्ता होता है। इस्लामी विद्वान खलील फराहिदी फरमाते हैं कि रमजान शब्द “रमजा” से लिया गया है। इसके मायने “गरम बालू और रेत” के हैं। जब आदमी उस पर चलता है तो उसके पांव झुलस जाते हैं।
इसी तरह रमजान की बरकत से गुनाह जल कर खाक हो जाते हैं। किछौछा दरगाह के पूर्व सज्जादानशीन सै. फखरुद्दीन अशरफ के जानशीन ( उत्तराधिकारी ) सै. मोहामिद अशरफ “शारिक मियां” बताते हैं कि ओलमा की एक जमात यह भी कहती है कि “रम्ज” के मायने बारिश के हैं और बारिश की वजह से चीजें धुल जाती हैं। ऐसे ही रमजान के रोजे की बरकत से इंसान के गुनाह धुल जाते हैं। दरअसल रमजान मुसलमानों के लिए नेकियों का मौसमे बहार और गुनाहों के लिए मौसम में खरीफ है। हदीस शरीफ में है कि “रोजा” मेरे लिए और मैं ही उसका बदला दूंगा। हर एक नेक अमल का बदला जन्नत है मगर रोजा का बदला “अल्लाह तआला” खुद हैं। इसलिए जन्नत में हर रोजेदार को अल्लाह ताला का दीदार नसीब होगा।
